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Showing posts from November, 2017

अनकहीं जिंदगी

अनकहीं जिंदगी जिंदगी  कभी पतझड़  तो कभी बहार है तू।  चंद लम्हो की , अन कही किताब है तू  मैंने पढ़ना चाहा है  पर मेरी समझ से बहार है तू  जिंदगी कही अल्हड़ , तो कभी शांत है तू।  बारिश की बूंदो की धार को , मैंने पीना चाहा।  पर जीवन की  ख़ाली  प्यास है तू  जिंदगी कभी पहाड़  तो कभी समतल है तू  तृष्णा की बनी  नाव में  बैठना चाहा तो  पर, टूटने के दर से  किनारे पर खड़ी नाव है तू  जिंदगी  अनकहीं जिंदगी  जिंदगी  कभी पतझड़  तो कभी बहार है तू।  रचित : कमल कुमार "आज़ाद "

कल्पना

कल्पना  अहसास होता है, एकांत क्षणों  में।  पायल बजने का , अनुभव होता है।  सावन की रातो में , कोमल स्पर्श का।  प्रतीक्षा होती  है , धुंधले सपनो में।  तुम्हारे आने की , खोता हु खयालो में।  याद आती है , तुम्हारे आलिंगन की।  दीदार होता है , पलभर में तुम्हारा।  एक अमिट स्मृति का , मुझे  नहीं था मालूम।  ऐसा संसार होता है , प्रेम की कल्पना का।  कल्पना में जीना , जिंदगी से अच्छा है।  अंदेशा नहीं है यहाँ , किसी मजनू की मौत का।    द्वारा : कमल कुमार  18/11/2017

कमल का फूल : एक कविता

  कमल का फूल  : एक कविता मै  लाल   कमल हू,  रंग बिरंगा फूल हू। कीचड़ में जन्मा  हू  ,  फिर भी अच्छा लगता हू ।  हर कोई मुझे ,  तोड़ता रोंदता है  मेरे लहू को,  गंदे पानी में छोड़ता है।  मेरी जड़ो को , उखाड़कर खा जाता है।  दिखने में सुन्दर ,  पर कोई सुगंध आती  नहीं ।  सभी देवो का सिंहासन , पर सर का ताज नहीं।  कष्टों   को झेलना , अब आदत  सी बन चुकी  है।  घर में मुझे कोई , अक्सर सम्मान से  रखता नहीं।  मैं जिंदगी हू , गरीबी में जन्मी हू। फिर भी प्यारी लगती हू ,  पर हर कोई , मुझे तोड़ता रूठता   है।  मैं  कमल ....... द्वारा : कमल कुमार "आज़ाद" 15/11/2017 ''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''...

विकास या विनाश

विकास या विनाश  पर्यावरण के विनाश से , जो विकास कर  रहे है।  वास्तव में तो वो , नस्लों को बर्बाद कर रहे है।  खुदा उनको अकल दे  , ऐसा घिनोना , जो काम कर रहे है।  प्रदूषण के जहर से , उजाले  में अंधकार हो गया है।  बात अचरज़ की है , अम्लीय बरसात का उदय हो रहा है।   अंधी दौड़ में हम कहा आ गए , शुद्ध हवा का पड़ा अकाल , सबकी आंखे है बस लाल ,  ख़ुदा उनको अकल दे ,  विकास के नाम पर , जो बीमारिया दे रहे है।   वृक्षों के अभाव से , धरती गर्मी से झुलसने लगी है।  पानी को तरसते , सभी हाहाकार करने लगे है  हरी भरी खेती,   अब बंजर होने लगी  है।  अकाल मृत्यु की ओर,   हम बढ़ने लगे है।  खुदा उनको अकल दे, जिस डाल पर बैठे  देखो उसी  को काट रहे है। .. पर्यावरण के विनाश से , जो विकास कर रहे है।  असल में तो नस्ल को बर्बाद कर रहे है।   द्वारा : कमल कुमार  १४/११/२०१७  ...

वफ़ा

         वफ़ा  वफ़ा कर नहीं सका , चलो  तो बेवफा ही सही।  मेहंदी  रच नहीं  सकी , तो कोरे हाथ ही  सही।   तुमने किसी गैर को चाहा  चलो अच्छा ही किया।  मुहब्बत  में मिटने का डर  अब मुझमे नहीं।  तुम बनो दुल्हन किसी रहीस की  चलो में रस्ते का फ़क़ीर ही सही।  द्वारा : कमल कुमार  दिनांक : १३/११/२०१७

सिसकता सागर

सिसकता सागर  हंसी के चाह में , यूही उम्र  गुजर गयी।  कोशिश  जो की मुस्कुराने की , चुपचाप रूलाया अपनों ने।  मोती एक अनमोल रतन   है , रहता सागर की गहराई में।  सुख भी एक मोती जैसा , खोया जीवन के खाई में।  दुःख में भी है हॅसने का मजा , चुपचाप  दिखाया  लहरों ने। .  सिखाया सबक़ जिंदगी ने , शांत सागर की  लहरों ने।  छल कपट मिलते है अक्सर , अपने ही अजीज लोगो से।  उदासियों में भी चंचल होना , चुपचाप सिखाया लहरों ने।  जीवन भी है सागर के माफिक , कभी उछलता कभी मचलता।  सपने देखे जो कल के लिए,  वर्तमान में जीना सीखो। . गिर गिर कर  कैसे उठते है ,  सीखो  सागर की लहरों से ।  द्वारा : कमल कुमार  13/11/2017

जिन्दगी

जिन्दगी चिन्ता की सेज़ पर , पिंघलतीं है जिंदगी।  अंगारों की मेज़ पर , जलती है जिंदगी।  सागर में लहरों  की तरह , पथ्थरो से टकराती  है जिंदगी।  अगर रुक जाये  जिंदगी  तालाब  की तरह  सड़ जाये है जिंदगी।  जिंदगी कभी बहार तो  कभी पतझड़ है जिंदगी  कभी नदी में बहता पानी है जिंदगी  आड़े तिरछे बहाव  की तरह है जिंदगी  टिमटामटे तारे की तरह है जिंदगी  काले बादल में कड़कती    जिंदगी  रात्रि  काले अँधेरे की  चादर  सुबह सुर्य की रौशनी में चमकती है   जिंदगी।  गिटार के तारो के तरह कभी  सुर बेसुर  बजती है जिंदगी  फूलो के बिस्तर पर  प्यार में मचलती है जिंदगी  सुख दुःख के साथ  कभी  आँसुओ में कटती है जिंदगी।  ये अजीब है  जिंदगी,  पता नही कहा ले जाएगी जिंदगी  ठंडी गरम  हवाओ में , छिपा है   रह्स्य जिंदगी का   पता नहीं ...

जियों जरूर

जियों जरूर     हम जिसको चाहे वो मिलता नहीं , जो हमें चाहे . हम उसके होते नहीं / फिर क्यों दिल , जलाते है हम / और कागज़ पर, बस  लिखते जाते है / अपनी जिंदगी की ख़ुशी को ,  दुसरो को सुना कर , कम किये जाते है || जीना हमें अपने आप से है , हम तो है पंछी एक डाल के / बड़े हुए तो उड़ेगे जरुर , कोई हो ना हो , जिंदगी में जीये  जरुर/// द्वारा : कमल कुमार  13/11/2017

क़भी -क़भी

कभी  कभी   तुमसे बिछड़ के दिल में , बहुत दर्द है मगर , ख्वाबो में तुमसे प्यार,   करेंगे कभी कभी।  मै जानता हु अब कभी , हम मिल न सकेंगे , मर कर भी इंतज़ार , करेंगे कभी कभी।  ये दिल एक आईना है  तेरे प्यार की क़सम , छुपके  तेरा दीदार , करेंगे कभी कभी।  रातों की स्याही में , तेरी यादो  की महक से , विरानो को सजाया  करेंगे कभी कभी।  अब दिल में कोई आस नहीं  तेरे मिलन की , ख्वाबो में तुमसे प्यार , करेंगे कभी कभी।   द्वारा :: कमल कुमार   ०२/११ /२०१७ 

सुनहरे पल

  सुनहरे  पल   सुनहरे काले बालो की चमक , अब  उड़ चूकी है।  सतरंगी उमड़े बादल  की उमग , अब थम चुकी है।  जीवन में प्रेम की बरसात , वोतो कभी की बंद हो चुकी है।  फिर क्यों इंतज़ार उन पलों का ,  जो खो   चुके  है  कही।  जिनसे आशा थी  मन को बहलायगे कभी , सभी गुम  हुए एक एक करके कही।  अब अँधेरी राते  कटती नहीं ,  रोशनी में भी कोई आस लगती नहीं। भूल जाओ जमाने को ,जिसने तुमको भुला दिया , आओ फिर दीये जलाये जिंदगी के। जीने की प्यास कभी बुझने न दे , अभी कई और है मंजिले आसमा में। जिनको छूने की  तम्मना रहने दो, फिर लिखेंगे नया फलसफा   जिंदगी का। द्वारा  : कमल कुमार  ०१/११/२०१७