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अनकहीं जिंदगी


अनकहीं जिंदगी



जिंदगी  कभी पतझड़ 
तो कभी बहार है तू। 

चंद लम्हो की ,
अन कही किताब है तू 

मैंने पढ़ना चाहा है 
पर मेरी समझ से बहार है तू 


जिंदगी कही अल्हड़ ,
तो कभी शांत है तू। 

बारिश की बूंदो की धार को ,
मैंने पीना चाहा। 

पर जीवन की 
ख़ाली  प्यास है तू 

जिंदगी कभी पहाड़ 
तो कभी समतल है तू 

तृष्णा की बनी  नाव में 
बैठना चाहा तो पर,

टूटने के दर से 
किनारे पर खड़ी नाव है तू 

जिंदगी अनकहीं जिंदगी 

जिंदगी  कभी पतझड़ 

तो कभी बहार है तू। 


रचित : कमल कुमार "आज़ाद "





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